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Tuesday, November 20, 2018 1:00 PM

Dr. Kumar Vishwas Poetry Saal mubarak

उम्र बाँटने वाले उस ठरकी बूढ़े ने
दिन लपेट कर भेज दिए हैं
नए कैलेंडर की चादर में
इनमें कुछ तो ऐसे होंगे
जो हम दोनों के साझे हों।
सब से पहले
उन्हें छाँट कर गिन तो लूँ मैं!
तब बोलूँगा
‘साल मुबारक‘
वरना अपना पहले जैसा
हाल मुबारक

Dr. Kumar Vishwas Poetry Safai mat dena

एक शर्त पर मुझे निमन्त्रण है मधुरे स्वीकार
सफ़ाई मत देना!
अगर करो झूठा ही चाहे, करना दो पल प्यार
सफ़ाई मत देना

अगर दिलाऊँ याद पुरानी कोई मीठी बात
दोष मेरा होगा
अगर बताऊँ कैसे झेला प्राणों पर आघात
दोष मेरा होगा
मैं ख़ुद पर क़ाबू पाऊंगा, तुम करना अधिकार
सफ़ाई मत देना

है आवश्यक वस्तु स्वास्थ्य -यह भी मुझको स्वीकार
मगर मजबूरी है
प्रतिभा के यूँ क्षरण हेतु भी मैं ही ज़िम्मेदार
मगर मजबूरी है
तुम फिर कोई बहाना झूठा कर लेना तैयार
सफ़ाई मत देना

Monday, November 19, 2018 8:00 PM

Dr. Kumar Vishwas Poetry Vida lado

विदा लाडो!
तुम्हे कभी देखा नहीं गुड़िया,
तुमसे कभी मिला नहीं लाडो!
मेरी अपनी दुनिया की अनोखी उलझनों में
और तुम्हारी ख़ुद की थपकियों से गढ़ रही
तुम्हारी अपनी दुनिया की
छोटी-छोटी सी घटत-बढ़त में,
कभी वक़्त लाया ही नहीं हमें आमने-सामने।
फिर ये क्या है कि नामर्द हथेलियों में पिसीं
तुम्हारी घुटी-घटी चीख़ें, मेरी थकी नींदों में
हाहाकार मचाकर मुझे सोने नहीं देतीं?
फिर ये क्या है कि तुम्हारा ‘मैं जीना चाहतीं हूँ माँ‘ का
अनसुना विहाग मेरे अन्दर के पिता को धिक्कारता रहता है?
तुमसे माफी नहीं माँगता चिरैया!
बस, हो सके तो अगले जनम
मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में हुलसना बच्चे!
विधाता से छीन कर अपना सारा पुरुषार्थ लगा दूंगा
तुम्हें भरोसा दिलाने में कि
‘मर्द‘ होने से पहले ‘इंसान‘ होता है असली ‘पुरुष‘!

Dr. Kumar Vishwas Ruh jism ka thor thikana chalta rahta he

रूह जिस्म का ठौर ठिकाना चलता रहता है
जीना मरना खोना पाना चलता रहता है

सुख दुख वाली चादर घटती वढती रहती है
मौला तेरा ताना वाना चलता रहता है

इश्क करो तो जीते जी मर जाना पड़ता है
मर कर भी लेकिन जुर्माना चलता रहता है

जिन नजरों ने काम दिलाया गजलें कहने का
आज तलक उनको नजराना चलता रहता है

Dr. Kumar Vishwas Rang duniya ne dikhaya he

रंग दुनिया ने दिखाया है निराला, देखूँ
है अँधेरे में उजाला, तो उजाला देखूँ 

आइना रख दे मेरे हाथ में, आख़िर मैं भी
कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूँ

जिसके आँगन से खुले थे मेरे सारे रस्ते
उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ

Dr. Kumar Vishwas Poetry Ye itne log kha jate he subha subha

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुए
हंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों
शाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?

ये इतने पाँव सड़क को सलाम करते हैं
हरारतों को अपनी बक़ाया नींद पिला
उसी उदास और पीली सी रौशनी में लिपट
रात तक उन ही मकानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानांे में लौटने के लिए!

ये इतने लोग, कि जिनमे कभी मैं शामिल था
ये सारे लोग जो सिमटे तो शहर बनता है
शहर का दरिया क्यों सुबह से फूट पड़ता है
रात की सर्द चट्टानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानों में लौटने के लिए!

ये इतने लोग क्या इनमें वो लोग शामिल हैं
जो कभी मेरी तरह प्यार जी गए होंगे?
या इनमें कोई नहीं जि़न्दा सिर्फ़ लाशें हैं
ये भी क्या जि़न्दगी का ज़हर पी गए होंगे?
ये सारे लोग निकलते हैं घर से, इन सबको
इतना मालूम है, जाना है, लौट आना है

ये सारे लोग भले लगते हों मशीनों से
मगर इन जि़न्दा मशीनों का इक ठिकाना है
मुझे तो इतना भी मालूम नहीं जाना है कहाँ?
मैंने पूछा नहीं था, तूने बताया था कहाँ?
ख़ुद में सिमटा हुआ, ठिठका सा खड़ा हूँ ऐसे
मुझपे हँसता है मेरा वक़्त, तेरे दोनों जहाँ

जो तेरे इश्क़ में सीखे हैं रतजगे मैंने
उन्हीं की गूँज पूरी रात आती रहती है
सुबह जब जगता है अम्बर तो रौशनी की परी
मेरी पलकों पे अंगारे बिछाती रहती है
मैं इस शहर में सबसे जुदा, तुझ से, ख़ुद से
सुबह और शाम को इकसार करता रहता हूँ

मौत की फ़ाहशा औरत से मिला कर आँखें
सुबह से जि़न्दगी पर वार करता रहता हूँ
मैं कितना ख़ुश था चमकती हुई दुनिया में मेरी
मगर तू छोड़ गया हाथ मेरा मेले में
इतनी भटकन है मेरी सोच के परिंदों में
मैं ख़ुद से मिलता नहीं भीड़ में, अकेले में

जब तलक जिस्म ये मिट्टी न हो फिर से, तब तक
मुझे तो कोई भी मंजि़ल नज़र नहीं आती
ये दिन और रात की साजि़श है, वगरना मेरी
कभी भी शब नहीं ढलती, सहर नहीं आती
तभी तो रोज़ यही सोचता रहता हूँ मैं
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह

Dr. Kumar Vishwas Poetry Mosam ke gav

बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव
अतः डरी
लज्जित-सी पहुँची
छूने दिवस-पिया के पाँव!

आँखों वाली
क्षितिज-रेख पर
काला-सूरज उदित हुआ
धरती का कर
निज दुहिता के
पाँव परस कर मुदित हुआ
कम्पित शब्द-गोट ने
सहसा चला
एक ध्वनिवाही दाँव!
बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव

मौन-शीत पसरा
घर-आँगन की
गतिविधियाँ सिमट गईं,
किरणों की दासियाँ
कुहासे के
अनुचा से लिपट गईं
दृष्टि अराजक हुई
छा गयी
नभ से आपदकाली छाँव!
बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव

Sunday, November 18, 2018 7:00 PM

Dr. Kumar Vishwas Me toh jhoka hu

मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना, तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा

हो के क़दमों पर निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल कर भी मैं ख़ुश्बू बचा ले जाऊँगा

कौन-सी शै तुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा

क़ोशिशें मुझको मिटाने की मुबारक़ हों मगर
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जाऊँगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त-दुश्मन हो गए
सब यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा

Dr. Kumar Vishwas Poetry Mere sapno ke bhag me

कि जैसे दुनिया देखने की
ज़िद के सही साँझ
न होने पर पूरा,
सो जाए मचल-मचल कर,
रोता हुआ बच्चा!
तो तैर आती हैं
उस के सपनों में,
वही चमकीली छवियाँ
जिन के लिए लड़ कर,
हार-थक गया था,
पत्थर-दुनिया से जाग में!
ऐसे उतर आती हो तुम
रात-रात भर
मेरे सपनों के भाग में!

Dr. Kumar Vishwas Mahfill mahfill muskana toh padta he

महफ़िल महफ़िल मुस्काना तो पड़ता है
खुद ही खुद को समझाना तो पड़ता है

उनकी आँखों से होकर दिल तक जाना
रस्ते में ये मैखाना तो पडता है

तुमको पाने की चाहत में ख़तम हुए
इश्क में इतना जुरमाना तो पड़ता है


Dr. Kumar Vishwas Bat karni he, Bat kon kare

बात करनी है, बात कौन करे
दर्द से दो-दो हाथ कौन करे

हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं 
चाँद ना हो तो रात कौन करे

हम तुझे रब कहें या बुत समझें 
इश्क में जात-पात कौन करे

जिंदगी भर कि कमाई तुम थे 
इस से ज्यादा ज़कात कौन करे

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Dr. Kumar Vishwas Poetry Maa

माँ
पालती है
पेड़ एक
लाड़ से
प्यार से
दुलार से।
माँ सुलाती है
लोरी गा
पिलाती है दूध
लुटाती है
तन मन प्राण
पेड़
होता बड़ा ज्यों-ज्यों
जड़ें
उसकी मजबूत
घुस जाती हैं
माँ में
हाथ पैर में
दिमाग में
और दिल में
चूसता है
ख़ून-पानी-माँस
महँगे आँसू
पेड़ पाता
विस्तार अद्भुत
देखता संसार
रूककर राह में
कितना बड़ा है पेड़
कितना लम्बा है पेड़
पेड़ बढ़ता
निस दिन
माँ से धँसी
जड़ों से
दूर होता
निस दिन!

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Saturday, November 17, 2018 5:58 PM

Dr. Kumar Vishwas Poetry Pawan ne kha

पवन ने कहा
सौंप दो मुझे
अपना सब सत्व
तमस व रजत
चाहती हूँ मैं
स्वयं से जोड़ना
तुमको
यही होगी गति उत्तम
शब्द सार्थक
नियति उत्तम
किन्तु मुझे करना
क्षमा तुम
मैं रहूंगी – वहीं
अपने चन्दन वन में
बहूँगी वहीं
तुम्हारी धरती पर
आ नहीं सकती
अभी मैं
कभी मैं
किन्तु फिर भी
मैं सदा उत्सुक हूँ
तुमसे सहज
व्यापार हेतु
प्यार हेतु!

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Dr. Kumar Vishwas Poetry Pyar jab jisam ki chabi me dafan ho jaye

प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए,
ओढ़नी इस तरह उलझे कि कफ़न हो जाए,

घर के एहसास जब बाजार की शर्तो में ढले,
अजनबी लोग जब हमराह बन के साथ चले,

लबों से आसमां तक सबकी दुआ चुक जाए,
भीड़ का शोर जब कानो के पास रुक जाए,

सितम की मारी हुई वक्त की इन आँखों में,
नमी हो लाख मगर फिर भी मुस्कुराएंगे,

अँधेरे वक्त में भी गीत गाये जायेंगे...

लोग कहते रहें इस रात की सुबह ही नहीं,
कह दे सूरज कि रौशनी का तजुर्बा ही नहीं,

वो लड़ाई को भले आर पार ले जाएँ,
लोहा ले जाएँ वो लोहे की धार ले जाएँ,

जिसकी चौखट से तराजू तक हो उन पर गिरवी
उस अदालत में हमें बार बार ले जाएँ

हम अगर गुनगुना भी देंगे तो वो सब के सब
हम को कागज पे हरा के भी हार जायेंगे

अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जायेंगे...

Dr. Kumar Vishwas Poetry Preeto

तुम

समझ तो रही हो न, प्रीतो!
वे सब बातें
जो मैं
इस सूने कमरे की
दीवारों को
समझा रहा हूँ
आधी रात से
तुम
गुनगुना तो रही हो न, प्रीतो!
वे सब गीत
जो मैं
तिल-तिल कर
मरते हुए
रच रहा हूँ
तुम
देख तो रही हो न, प्रीतो!
वे सब पाप
जो मैं
तुम्हारी पवित्रता से
डरते हुए
कर रहा हूँ
ओ मेरी
एकमात्र श्रोता!
देखता हूँ
तुम कब तक नहीं रोतीं

Dr. Kumar Vishwas Poetry Neh ke sandharbh bone ho gaye

नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं,
शक्ति के संकल्प बोझिल हो गये होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे चरण मेरी कामनायें हैं,
हर तरफ है भीड़ ध्वनियाँ और चेहरे हैं अनेकों,
तुम अकेले भी नहीं हो, मैं अकेला भी नहीं हूँ 
योजनों चल कर सहस्रों मार्ग आतंकित किये पर,
जिस जगह बिछुड़े अभी तक, तुम वहीं हों मैं वहीं हूँ 
गीत के स्वर-नाद थक कर सो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे कंठ मेरी वेदनाएँ हैं,
नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं,
यह धरा कितनी बड़ी है एक तुम क्या एक मैं क्या?
दृष्टि का विस्तार है यह अश्रु जो गिरने चला है,
राम से सीता अलग हैं,कृष्ण से राधा अलग हैं,
नियति का हर न्याय सच्चा, हर कलेवर में कला है,
वासना के प्रेत पागल हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हरे माथ मेरी वर्जनाएँ हैं,
नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं,
चल रहे हैं हम पता क्या कब कहाँ कैसे मिलेंगे?
मार्ग का हर पग हमारी वास्तविकता बोलता है,
गति-नियति दोनों पता हैं उस दीवाने के हृदय को,
जो नयन में नीर लेकर पीर गाता डोलता है,
मानसी-मृग मरूथलों में खो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी योजनायें हैं,
नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं!

Dr. Kumar Vishwas Devdas mat hona

खुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना
इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना

देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना
ये सारे खेल हैं, इनमें उदास मत होना

जो भी तुम चाहो, फ़क़त चाहने से मिल जाए
ख़ास तो होना, पर इतने भी ख़ास मत होना

किसी से मिल के नमक आदतों में घुल जाए
वस्ल को दौड़ती दरिया की प्यास मत होना

मेरा वजूद फिर एक बार बिखर जाएगा
ज़रा सुकून से हूँ, आस-पास मत होना